कल्चरली असर्टिंग इंडिया
20 फ़रवरी/ इंडियन सोशल इंस्टिट्यूट, नई दिल्ली
प्रेस विज्ञप्ति
कल्चरली असर्टिंग इंडिया (नेशनल प्लेटफॉर्म फॉर पीपुल्स कल्चर ) पिछले दो सालों से जनसरोकारों से सीधा रिश्ता रखने वाले सांस्कृतिक पहलू "ज़िन्दगी जीने के साधन" और उसके बुनिदी सच पर चर्चा कर समझ विकसित कर सहयोगी समूहों द्वारा सांस्कृतिक माध्यमों से पहल करता रहा है, साथ ही साथ इस पर हमला करने वाली सोच जैसे सांप्रदायिकता, जातिवाद, क्षेत्र वाद, लिंगभेद, अंधविश्वास, दहेज़ एवं भाषा के प्रश्न को उजागर कर निरंतर काम करता रहा है। इसी कड़ी में दिल्ली यंग आर्टिस्ट फोरम व अवध पीपुल्स फोरम ने 20 फ़रवरी 2013 को इंडियन सोशल इंस्टिट्यूट, में " दिल्ली में महिलाओं के प्रति बढती हिंसा व उत्तर प्रदेश में बढ़ते सांप्रदायिक हमले" पर एक परामर्श का आयोजन किया, कार्यक्रम की शुरूआत करते हुए अफाक ने इन दोनों मुद्दों की गंभीरता को दर्शाया कि किस प्रकार ये दोनों मुद्दे हमारी संस्कृति में ज़हर घोल रहे हैं, लगातार सांप्रदायिक हमलों ने उत्तर प्रदेश के माहौल को खौफनाक बना दिया है, उन्हों ने अखिलेश सरकार के बन्ने के बाद सुनियोजित सांप्रदायिक हमले को एक साजिश बताया,
दिल्ली में वाइट लाइन गैंग रेप मामले के बाद विरोध के स्वर को रेखांकित करते हुए कहा कि इतने विरोध के बाद भी लगातार घटनाएँ हुयी हैं जो अब सिर्फ घटना नहीं बल्कि समाज की मानसिकता को दर्शाता है, इसके खिलाफ समाज में अभियान चलाने की ज़रूरत है
पहले स्त्र " दिल्ली में महिलाओं के प्रति बढती हिंसा " का संचालन करते हुए डॉ बदर जहाँ ने पितृतात्मक सत्ता को इसका ज़िम्मेदार ठहराते हुए बात चीत की शरुआत की, पैनल के पहले वक्ता पी यु सी एल के श्री शिवाकांत गोरखपुरी ने भी माहौल और शिक्षा व्यवस्था को ज़िम्मेदार ठहराया, दुसरे वक्ता डॉ पवन कुमार ने महिलाओं को अपने हक के लिए सामने आने की वकालत की,
टिप्पणी करते हुए झुग्गी झोपड़ी एकता मंच के अध्यक्ष श्री जवाहर सिंह ने झुग्गी बस्ती की महिलाओं एवं खास तौर पर जवान लड़कियों द्वारा छेड़खानी बर्दाश्त कर जीने की कुछ घटना का ज़िक्र किया, उन्हों ने कहा कि हम बस्ती में रोज़ देखते हैं कुछ आवारे और बदमाश लोग नुक्कड़ पर खड़े होकर टोंट कसते हैं, कोई उसे कुछ नहीं कहता चाहे पुलिस हो या लोग, अब हमें इसके खिलाफ खडा होना होगा
प्रोफेसर डी एन कालिया ने बात रखते हुए महिलाओं द्वारा रोज़ मर्रा की ज़िन्दगी में आने वाली परेशानी का ज़िक्र किया, उन्हों ने कहा कि हम कितने insensitive हैं इस बात का पता इसी से चलता है कि शहर में महिलाओं के लिए एक शौचालय का इंतज़ाम तक नहीं है, पुरुषवादी समाज एकतरफा सोचता है, काम के स्थान पर महिलाओं के लिए शौचालय हो ये बात तो उठने लगी है लेकिन सडक पर इसका क्या इंतज़ाम है ? सरकार को और हमें इस पर सोचना चाहिए कि हम इस दौर में कहाँ खड़े हैं,
इस अवसर पर युवा कार्यकर्ता अली ने भी समाज को शिक्षा के माध्यम से सजग बनाने की बात कही, गवाह दी विटनेस के अनूप थापा ने भी यही बात दोहराई कि समाज को महिलाओं के प्रति जागरूक करना होगा, केवल किताबी बातों से काम नहीं चलेगा , पढ़े लिखे लोग भी ऐसी हरकतें खूब करते हैं, इस लिए इसका भी जवाब तलाश करना होगा,
निर्माण मजदूर शक्ति संगठन के श्री आजाद ने कहा की ये मानसिकता है, जो वर्षों में बनाई गयी है, बाज़ार भी इन सब का ज़िम्मेदार है जिसने महिलाओं को एक वास्तु के रूप में परोसा है, ख़ास तौर पर महिलाओं को विज्ञापन करने का सामान बना दिया गया है,
मानवधिक कार्यकर्ता महताब आलम के आन्दोलन के प्रिपेक्ष के विस्तार की बात की, चाहे कोई भी महिला हो हमें हर किसी के समर्थन में अना चाहिए, उन्हों ने कहा कि आन्दोलन के बाद भी पुलिस का रवैया बदला नहीं है,
दिल्ली यंग आर्टिस्ट्स फोरम के राजू और प्युष ने भी अपने विचार रखे, उन्हों ने अपने फोरम के कार्यक्रम की जानकारी दी की दिल्ली में महिला दिवस तक हमारा अभियान चल रहा है, हम बस्तियों में यात्रा करेंगे कि लोग इस मुद्दे के प्रति जागरूक हों और खुद को परिवर्तित करें
सदरे आलम ने कहा कि इस मुद्दे पर छोटी छोटी बैटन पर ध्यान देने की ज़रूरत है, हम बेटी को बीटा कह कर पुकारते हैं, ये उसके अस्तित्व को ही ख़तम कर देता है , बेटे की चाह में ४ - ५ बेटियां पैदा कर जाते हैं, सभी बेटियां घर के अन्दर ही बेघर हो जाती है, इस अवसर पर अजय जी ने भी शिक्षा और जागरूकता अभियान चलने की बात की, झुग्गी झोपडी एकता मंच के अरविन्द ने भी महिलाओं के लिए बेहतर समाज बनाने पर बल दिया , उन्हों ने पुलिस के रवैये की मुखालफत की,
दूसरा सत्र :- उत्तर प्रदेश में बढ़ते साम्प्रादायिक हमले।
दूसरे सत्र की शुरूआत करते हुए अफाक नें उ0 प्र0 में सिलसिलेवार हुए साम्प्रादायिक हमलों को आगामी लोकसभा चुनावों में राजनीतिक दलो की रणनीति से जोड़ते हुए बातचीत की षुरूआत की। पैनल में शामिल आल इंडिया कचरा श्रमिक महासंघ के धर्मेन्द्र यादव (बरेली) ने कहा कि इस तरह की बढ़ रही घटनाओं में बजरंग दल,हिन्दू युवा वाहिनी व आर0एस0एस0 सहित उसके अन्य घटक दलों की भूमिका किसी से छुपी नही है, लेकिन जिस तरह से सरकार और प्रशासन इनके सहयोगी की भूमिका में नजर आते है उससे स्थिति और भयावह होती जा रही है। इन फिरकापरस्त ताकतों को जब तक सरकारें खाद-पानी देती रहेगी, तबतक ऐसी घटनाये होती रहेगी। इसके लिए जरूरी है कि ऐसी घटनाओं में लिप्त व्यक्तियों एवं सगंठनों को चिन्हित करके तत्काल कार्यवाही की जाय व आर0एस0एस0 जैसे सगंठनों पर जिनकी संलिप्तता आंतकावादी घटनाओं में भी रही है तत्काल प्रतिबन्ध लगाये जायें, तभी उ0 प्र0 सहित पूरे देश में बढ़ रही सांप्रदायिक हिंसा पर रोक लगायी जा सकती है।
शाह आलम- उ0 प्र0 में सिलसिलेवार हुई साम्प्रदायिक हिंसा में मीडिया की साम्प्रदायिकता पर प्रहार करते हुए शाह ने प्रेस कौसिंल आफ इंडिया की रिर्पोट का हवाला देते हुए प्रिन्ट एवं इलेक्ट्रानिक मीडिया पर सवाल खड़ा किया कि जिस तरह से फैजाबाद में अल्पसंख्यक समुदाय पर हुए हमले को मीडिया ने स्वंय साम्प्रदायिक संगठनों को बचाने के लिए झूठे समाचार प्रकाशित किये इससे उनकी विश्वसनियता पर ग्रहण लग चुका है और प्रेस की भूमिका भी जाच के दायरे में आ गयी है। सरकार को चाहिए कि ऐसे समाचार माध्यमों पर भी तत्काल प्रतिबंध लगाये जिसका दोश साम्प्रादियकता फैलाने में सिद्व हुआ है।
गुफरान सिददीकी जो कि उ0 प्र0 के फैजाबाद से नाता रखते हैं, उन्हों ने कहा कि उ0 प्र0 में साम्प्रदायिक हमलों का सिलसिला कोशी कलां से शरू होता हुआ प्रतापगढ़, बरेली, मसूरी (गाजियाबाद) आदि स्थानों से होकर आखिर अयोध्या से सटे फैजाबाद पहुचा जिसकी आशंका पिछले 3 महीनों से शहर के अमन पंसन्द लोग जाहिर कर रहे थें। लेकिन न तो सरकार और शहर की लोकल खुफिया संगठन इस ओर देख पाये या यूँ कहें कि अपनी आखे मूदें रहे। बाबरी मस्जिद शहादत की 20वीं बरसी पर फिरकापरस्त ताकतों ने आखिर शहर को आग के हवाले कर दिया और पुलिस अपने चिरपरिचित आंदाज में केन्द्रीय दुर्गा पूजा समिति के गुर्गो की समर्थक बनी रही और मुस्लिम समुदाय की सैकड़ो दूकानों को लूटकर आग के हवाले कर दिया गया । लेकिन जिले की पुलिस सिर्फ आग बुझाने वालों को दौड़ाती रही लेकिन लूटपाट करने वालों को अराम से निकल जाने के लिए सुरक्षित रास्ता देती नज़र आयी, उससे सरकार की मंशा साफ हो जाती है। कमोबेश यही नज़ारा पूरे देश में देखने को मिलता है। उ0 प्र0 में तो जैसे पुलिस, सरकार और साम्प्रदायिक शक्तियों का गठजोड़ सा चल रहा है और मीडिया इस गठजोड़ को मजबूत करती नज़र आ रही, है जैसे आज मीडिया ने ‘समुदाय विषेश’ व ‘सम्प्रदाय विषेश’ जैसे साम्प्रदायिक शब्दों को गढ़ लिया है। इससे साफ पता चलता है कि देश को अब ऐसे समाचार माध्यमों से भी सावधान रहने की आवयश्कता है
कार्यक्रम में बोलते हुए सामाजिक कार्यकर्ता जवाहर सिंह ने ऐसी घटनाओं पर चिंता व्यक्त की व ऐसी घटनाओं के बारें में दिल्ली में कोई समाचार प्रकाशित न होने पर भी चिंता व्यक्त की। ऐसी घटनाओं को लेकर दिल्ली को सीधे ऐसे स्थान से जोड़ने के लिए आपसी तालमेंल बनाने की बात की ताकि ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए उचित प्रयास किये जा सके।
महिला आंदोलनों से जुड़ी अंजू दूबे ने ऐसे साम्प्रदायिक हमलों में महिलाओं को निशाना बनाने की मानसिकता की घोर अलोचना की, उन्होने गुजरात में हुए सामूहिक हत्या एवं बलात्कार का जिक्र करते हुए कहा कि यहाँ की सम्प्रदायिक ताकतों ने गुजरात हिंसा के माडल को दोहराना षुरू कर दिया है जिससे अल्पसंख्यक महिलाओं एवं बच्चों को ज्यादा से ज्यादा निशाना बनाया जा रहा है जिसकी गंभीरता से जांच होनी चाहिए। सरकार को साम्प्रदायिक हिंसा बिल को तत्काल पास करना चाहिए।
इससे बचने के लिए हमें संस्थागत कार्यक्रमो को चलाने पर ज़ोर देना होगा स्कूल कालेजो में जा कर स्वास्थ्य बहस चलानी होगी तब शायद महिलाओं एवं देदेश के सुरक्षित विकास की कामना कर सकते है।
No comments:
Post a Comment