Wednesday, June 8, 2011

गोष्ठी : जन आन्दोलनों में साहित्य की भूमिका




जनबात गोष्ठी
विषय: ‘‘ जन आन्दोलनों में साहित्य की भूमिका ’’
गांधी शांति प्रतिष्ठान, 7 जून 2011

प्रेस विज्ञप्ति

7 जून 2011 को गाँधी शान्ति प्रतिष्ठान में जनबात की ओर से एक गोष्ठी का आयोजन किया गया। गोष्ठी का विषय ‘‘ जन आन्दोलनों में साहित्य की भूमिका ‘‘ था। यहाँ पर जनआन्दोलनों और साहित्य से जुड़े हुए लोगों ने इस विषय पर चर्चा में भाग लिया। इस अवसर पर प्रो0 विजय भागलपुर, साहित्यकार संजीव, मदन कश्यप, सत्येन्द्र रंजन, प्रेमपाल शर्मा, धीरेन्द्र प्रताप सिंह, प्रेम भारद्वाज, परिमल माया सुधाकर, डा0 धन्नजय राय, राजीव रंजन, मनजूर अहमद आदि उपस्थित थे। चर्चा के दौरान समकालीन जनआन्दोलनों व साहित्य के विभिन्न पहलूओं पर खुलकर साहित्यकारों एंव आन्दोलनों से जुड़े लोगों ने विचार विर्मश में हिस्सा लिया और यह बात भी सामने आयी कि समय-समय पर ऐसे सवालों पर बहस और चर्चा की जरूरत है।

जनबात की ओर से कार्यक्रम की शुरुआत करते हुए सदरे आलम ने अपने अनुभव रखते हुए कहा कि 1998-99 के दौरान जे.एन.यू. में चल रहे छात्र आन्दोलन को साहित्यिक सहयोग देने की जो कोशिश शुरु हुई थी, जिसने धीरे-धीरे छात्रों के साथ-साथ दिल्ली के मजदूरों एंव नौजवान आन्दोलनों के बीच भी प्रगतिशील साहित्य को ले जाने का काम करते हुये 2001 तक एक रुप लेना शुरु किया जो 2002 के अन्त में जनबात के नाम से स्थापित हुआ। पिछले 9-10 सालों में तमिलनाडू, कर्नाटक, महाराष्ट्र, मध्यप्रदेश, राजस्थान, हरियाणा, पंजाब, हिमाचल, उत्तरांचल, उ0प्र0, बिहार और बंगाल में 44-45 एंव दिल्ली में छोटी-बड़ी लगभग 300 पुस्तक प्रदर्शनियों के साथ-साथ पोस्टर, बैनर, एंव अन्य कई रुपों में प्रगतिशील साहित्य को लोगों के सामने ले जाता रहा है। विश्व पुस्तक मेले से लेकर विश्व सामाजिक मंच, भारत रंग महोत्सव, जनसंगठनों के सम्मेलनों, रैलियों एंव अधिवेशनों के साथ-साथ ग्रामीणों के बीच पुस्तक प्रदर्शनियों में प्रगतिशील किताबों के प्रति लोगों की रुचि के अभूतपूर्व अनूभव रहे हैं। इस अनुभवों से यही समझ में आता है कि इसे और बेहतर करने की जरुरत है, जिसकी कोशिश जारी है। जन आन्दोलनों से जुड़े लोगों के बारे में अक्सर यह कहा जाता है कि लोग साहित्य नहीं पढ़ते लेकिन जिस तरह से आज साहित्य को व्यापारिक रूप दिया जा रहा है कि मजदूर वर्ग जो जन आन्दोलन में शामिल है किताब खरीद नहीं सकता।
हमारा अनुभव यह कहता है कि दस रूपये की किताबें
लोग खूब खरीदते हैं जो उनकी पढ़ने की ललक का
सबूत देती हैं। अत: लोगों पर आरोप लगाने से पहले किताबों की कीमतों पर विचार करने की जरुरत है साथ ही साथ रखरखाव पर विचार करते हुए लोगों तक पहुंचाने की जरुरत है।
इस गोष्ठी को नई कोशिश कहते हुए उन्हों ने कहा कि पिछले दिनों के कामों पर पुनर्विचार के बाद हमें ऐसा समझ में आया कि लोगों के साहित्य को लोगों तक पहुंचाने के साथ-साथ साहित्य के विभिन्न पहलुओं पर भर चर्चा करने की जरुरत है।

संदीप मील ने कहा कि आज साहित्य व्यापार का केंद्र हो गया है और उचित कीमत पर लोग साहित्य नहीं खरीद पाते है।
जनआन्दोलनों की चर्चा करते हुए सत्येन्द्र रंजन ने कहा
कि साहित्य का काम जनआन्दोलनों को दिशा देना एंव एक आम नागरिक को गम्भीर बनाकर समाज के प्रति सोचने पर मजबूर करना है। मगर जिस तरह से आज आन्दोलन हो रहे हैं, उनके चरित्र पर भी चर्चा जरूरी है।
रूस ने प्रगतिशील साहित्य के अनुवाद का काम बहुत बड़े
पैमाने पर किया है जो आंदोलनों को दिशा दिया।


प्रो0 विजय भागलपुर ने कहा कि साहित्य और जनआन्दोलनों के बीच दूरी बढ़ गई है जो एक चिन्ता का विषय है। जरूरत इस बात की है कि साहित्य को संघर्ष के बीच से तैयार किया जाए। आज के दिनों में चल रहे संघर्ष शुरू होने से पहले ही समझौते की पेशकश में लग जा रहे हैं।
धीरेन्द्र प्रताप का तर्क था कि समाज में सामुहिकता खत्म होने के कारण वैयक्तिका आयी है वैसे ही साहित्यमें भी वैयक्तिकता आ गई है और वो आंदोलनों में कोई भूमिका नहीं निभा रहा है। यहां तक कि वैयक्तिकता के कारण साहित्य ने अपनी शब्दावली भी बदली है। मजदूर एंव किसान जैसे शब्दों से साहित्य परहेज कर दलित, आदिवासी जैसे शब्द को अपने अन्दर लाया है, जिससे आन्दोलनों की सामुहिकता खत्म हो रही है।
सुधीर सुमन ने कहा कि आज भी जनपक्षीय साहित्य
रचा जा रहा है मगर वो जनता तक पहुँच नहीं पाता।
एक रचनाकार की सबसे बड़ी चुनौती है कि उसे
समकालीन घटनाओं पर नजर रखनी होती है।

डा0 धन्नजय राय ने कहा कि नवउदारवादी, उतरआधुनिकतावादी और व्यक्तिवादी प्रवृतियों के कारण साहित्य जन आंदोलनों से दूर हो गया। आज साहित्य को केवल आलोचना का साधन मान लिया है, सृजन और परिवर्तन से वो दूर हो रहा है।

राजीव रंजन ने कहा कि जो लोग संघर्षो के नाम परसाहित्यकार मदन कश्यप ने कहा कि साहित्य और आन्दोलन दोनों का रूप बदल रहा है। दुभाग्यपूर्ण यह है कि माक्र्सवादी आलोचकों ने मध्यमवर्गीय साहित्य को ही यहाँ प्रगतिशील साहित्य मान लिया । साहित्य का दायरा थोड़ा बड़ा है, एक किसान की एक फसल बर्बाद हो जाने के बाद भी वह दोबारा खेती ही करता है लेकिन एक बनिये का व्यापार बर्बाद होने के बाद वह दोबारा उस धन्धे में नहीं जाता इस बात को साहित्य ही सबसे बेहतर तरीके से बयान कर सकता है। उनके मुताबिक साहित्य की भुमिका जनआन्दोलनों के साथ साथ जीवन में भी देखने की जरूरत है।
आंदोलनों को भटका रहे है और कमजोर कर रहे है वो जग जाहिर है। परिमल माया सुधाकर ने कहा कि साहित्य का काम किसी विचार का प्रसार करना और उसकी व्याख्या करना है। वो आंदोलन की पृष्ठभूमी तैयार करता है। कबीर का साहित्य उनके आंदोलन का ही एक रूप था और डा. अम्बेडकर के विचार आंदोलन के रूप में ही थे।

झुग्गी बस्ती के आन्दोलन से जुड़े जवाहर सिंह ने कहा कि कोई भी व्यक्तिवादी आन्दोलन किसी भी विचार पर आधारित नहीं होता और वोह उस व्यक्ति के साथ ही समाप्त हो जाता है , ठेली रिक्शा मजदूरों के साथ संघर्ष करने वाले भोलेस्वर कुसवाहा ने कहा कि चाहे अना का आन्दोलन हो या रामदेव का उन्हों ने अपनी साहित्य तैयार की है हाँ यह बात ज़रूर है की वोह अपनी स्थित स्पष्ट नहीं कर पा रहा, ज़मीनी कार्यकर्ता भगीरत सिंहा और संतलाल ने भी कहानियों के ज़रिये सहित्य से सीख लेने की बात राखी,

कार्यक्रम का समाप्न करते हुए सदरे आलम ने कहा कि जन
आन्दोलनों से मतलब है कि समाज को बेहतर बनाने के लिए चलाया जा रहा आंदोलन। प्रगतिशील साहित्य की भूमिका उसे बेहतर करने की हो सकती है जिसे समझना जरूरी है। आन्दोलनकारियों को जब जेल में बंद किया जाता है तो उसे क्रांतिकरीयों की जेल डायरी ही सब से अधिक हौसला देती है। उन्होंने कहा कि यह बात तो बार-बार उठती रही है कि आन्दोलनकरी साहित्य नहीं पढ़ते। लेकिन उस से भी कही ज्यादा सच यह है कि साहित्यकारों ने खुद के दायरे को सीमित कर लिया है, वह आंदोलन में शामिल होना अपनी जिम्मेदारी नहीं समझते। आज अनमोल साहित्य वही है जिसे आन्दोलनकारियों ने लिखी है या सामाजिक बुराईयों को खत्म करने की पहल में शमिल लोगों ने लिखी है। अगर आन्दोलन वैचारिक हैं तो वैचारिक साहित्य विचार को मानने वाले और उसे फैलाने वालों द्वारा ही लिखा जा सकता है जिसे लोग उदाहरण समझ कर पढ़ना और मानना भी चाहेंगे। संघर्ष से परे सहित्य की भूमिका संघर्ष में नहीं हो सकती ।

आने वाले दिन में हम जनआंदोलन में साहित्य की भूमिका बढ़ाने के लिए अलग-अलग पहलुओं पर सेमिनार, सिम्पोजियम आदि करते रहेंगें ताकि इन मुददों पर बहस जारी रहे एवं साहित्य और संघर्ष का एक रिश्ता कयाम रहे।

धन्यवाद